नई दिल्ली। जंग तीन देशों अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच चल रही है, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है, खासकर तेल के खेल में। फरवरी के अंत में अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर संयुक्त हमले शुरू किए, जिसके जवाब में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को प्रभावी रूप से बंद कर दिया। यह जलडमरूमध्य दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस का मुख्य रास्ता है। परिणामस्वरूप, मिडिल ईस्ट से तेल निर्यात लगभग ठप हो गया, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति में इतिहास का सबसे बड़ा संकट पैदा हो गया।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के अनुसार, मार्च में वैश्विक तेल आपूर्ति में 8 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कमी आई है, जो कुल मांग का लगभग 8% है। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं- ब्रेंट क्रूड $100 प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है, कभी-कभी $119 तक छू गई। ईरान ने साफ कहा है कि स्ट्रेट से एक लीटर तेल भी नहीं गुजरेगा और अगर बंदी लंबी चली तो कीमतें $200 तक जा सकती हैं। ईरान ने जहाजों पर हमले तेज कर दिए हैं, कई टैंकर जलाए गए या क्षतिग्रस्त हुए, जिससे शिपिंग कंपनियां डर गई हैं।
एशिया और यूरोप में महंगाई का दबाव और बढ़ रहा
अमेरिका ने नौसेना से टैंकरों की एस्कॉर्ट की पेशकश की है, लेकिन ईरान की नौसेना और रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की हजारों नावें क्षेत्र में खतरा बनाए हुए हैं। IEA ने रिकॉर्ड 400 मिलियन बैरल तेल रिजर्व से रिलीज करने का फैसला किया है, लेकिन यह भी कीमतों को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पा रहा। इस जंग का असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं गैसोलीन, डीजल, जेट फ्यूल, प्लास्टिक, उर्वरक और ट्रांसपोर्टेशन जैसी चीजों की कीमतें बढ़ रही हैं। अमेरिका में गैसोलीन $3.58 प्रति गैलन तक पहुंच गई, जबकि एशिया और यूरोप में महंगाई का दबाव और बढ़ रहा है।
भारत जैसे देश, जो मिडिल ईस्ट से आधे से ज्यादा तेल आयात करते हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यहां पैकेज्ड वॉटर, FMCG उत्पाद और ईंधन महंगे हो रहे हैं, जबकि वैकल्पिक रूट से आयात बढ़ाने की कोशिश चल रही है। अगर युद्ध लंबा खिंचा तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी और महंगाई की नई लहर आ सकती है।
ईरान ने अपनाया सख्त रुख
फिलहाल तीनों देशों की जंग रुकने के आसार कम दिख रहे हैं। ईरान ने नए सुप्रीम लीडर के तहत सख्त रुख अपनाया है, जबकि अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम को निशाना बनाने की बात कही है। दुनिया ऊर्जा संकट से जूझ रही है, जहां तेल अब सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हथियार बन गया है।
