नई दिल्ली। अमेरिका-इजरायल के हमलों के 18 दिन बीत जाने के बाद भी ईरान में इस्लामिक शासन मजबूती से कायम है। अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, दिवंगत सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई ने अपने जीवनकाल में ऐसा सत्ता तंत्र तैयार किया था कि उनकी मौत के बाद भी व्यवस्था नहीं हिली।
हमलों में ईरान की सैन्य क्षमता को भारी नुकसान पहुंचा है। कई वरिष्ठ अधिकारी मारे गए और मिसाइल ठिकानों को तबाह किया गया, लेकिन IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) ने राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा ढांचे को संभाल रखा है। रिपोर्ट बताती है कि ‘रेजीम चेंज’ का लक्ष्य अब भी अधूरा है और शासन और मजबूत हो सकता है।
नए नेता के रूप में उभर रहे मोजतबा खामेनेई
खामेनेई ने सत्ता को किसी एक व्यक्ति पर निर्भर न रखते हुए IRGC और धार्मिक नेतृत्व के बीच संतुलन बनाया था, जो संकटकाल में भी स्थिरता प्रदान करता है। नए नेता के रूप में उनके बेटे मोजतबा खामेनेई उभर रहे हैं, जो IRGC के साथ मिलकर सत्ता संचालित कर सकते हैं। युद्ध के बाद IRGC की भूमिका और बढ़ सकती है, जिससे ईरान की नीतियां अधिक कट्टर और आक्रामक हो सकती हैं।
तेहरान में सत्ता समर्थकों की रैलियां जारी हैं, जहां युद्ध का समर्थन और विरोधी नारे लगाए जा रहे हैं, लेकिन सुरक्षा बलों की सख्ती से बड़े विरोध दबाए जा रहे हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने युद्ध शुरू करते समय ईरान की सत्ता बदलने का दावा किया था, लेकिन खुफिया आकलन से साफ है कि शासन बचेगा और और कठोर रुख अपना सकता है।
तेल की कीमतें 100 डॉलर पार हो गईं
ईरान ने खाड़ी देशों पर मिसाइल-ड्रोन हमले किए, होर्मुज स्ट्रेट पर पकड़ मजबूत की और वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित की, जिससे तेल की कीमतें 100 डॉलर पार हो गईं। अमेरिका पर यह जंग महंगी पड़ रही है, जहां अरबों डॉलर खर्च हो चुके और कई सैनिक मारे गए हैं।
कुल मिलाकर, खामेनेई की दूरदर्शिता से ट्रंप-नेतन्याहू का ‘रेजीम चेंज’ का सपना टूटता दिख रहा है। अमेरिका ने IRGC और हिजबुल्लाह को आतंकी घोषित करने की अपील की है, लेकिन इसका असर सीमित माना जा रहा है। क्षेत्रीय तनाव बढ़ रहा है, लेकिन ईरान का शासन फिलहाल मजबूत दिखाई दे रहा है।
