नई दिल्ली। ईरान के पास वर्तमान में लगभग 200-230 फाइटर/इंटरसेप्टर जेट्स हैं, जिनमें से अधिकांश 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले अमेरिका और पश्चिमी देशों से खरीदे गए थे। इसमें शामिल हैं: F-14 Tomcat (अमेरिकी, अब दुनिया में सिर्फ ईरान के पास), F-4 Phantom II (63-65), F-5 Tiger II (35-50), MiG-29 (18-24), Su-24 (21), Mirage F1 (12, इराक से प्राप्त), चीनी J-7/F-7 (17)।
इसके अलावा ईरान ने स्वदेशी रूप से Kowsar, Saeqeh और Azarakhsh जैसे जेट्स विकसित किए हैं, लेकिन विशेषज्ञ इन्हें मूल रूप से F-5 के अपग्रेडेड वर्जन मानते हैं। कुल मिलाकर ईरान की एयर फोर्स में 400-600 विमान हैं, लेकिन लड़ाकू जेट्स पुराने और सीमित संख्या में हैं।
युद्ध के 18 दिनों में ईरान ने अमेरिका-इजरायल के खिलाफ अपने फाइटर जेट्स को अभी तक नहीं उतारा है। मुख्य कारण पुरानेपन और तकनीकी कमजोरी है। ये जेट्स आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और स्टेल्थ तकनीक से लैस नहीं हैं।
अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण स्पेयर पार्ट्स की कमी
इजरायल के F-35 स्टेल्थ जेट्स और अमेरिका-इजरायल की एयर डिफेंस सिस्टम (जैसे आयरन डोम, पैट्रियट) के सामने ये आसानी से नष्ट हो सकते हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण स्पेयर पार्ट्स की कमी है, जिससे कई जेट्स सिर्फ कागजी रूप में हैं या सीमित समय उड़ सकते हैं।
रणनीतिक रूप से ईरान ने असिमेट्रिक वारफेयर अपनाई है – बैलेस्टिक मिसाइल (Fateh-110, Emad, Sejjil), क्रूज मिसाइल (Soumar, Hoveizeh) और ड्रोन (Shahed-136) का इस्तेमाल। ये सस्ते (Shahed ड्रोन ~$20,000), बड़ी संख्या में उपलब्ध और इंटरसेप्ट करना मुश्किल हैं, जबकि दुश्मन के इंटरसेप्टर स्टॉक (जैसे पैट्रियट) को तेजी से खत्म करते हैं।
ईरान-इजरायल के बीच कोई सीधी सीमा नहीं
अमेरिका ने अब तक $12 बिलियन खर्च किए हैं। ईरान-इजरायल के बीच कोई सीधी सीमा नहीं है, इसलिए लंबी दूरी की उड़ान के लिए एरियल रिफ्यूलिंग चाहिए, जो ईरान के पास सीमित है।
कुल मिलाकर, ईरान ने जेट्स को ‘छिपाकर’ रखा है ताकि उन्हें नष्ट होने से बचाया जा सके और भविष्य के लिए संरक्षित रखा जा सके। युद्ध में मिसाइल-ड्रोन रणनीति से दुश्मन को महंगा पड़ रहा है, जबकि पुराने जेट्स को मैदान में उतारना आत्मघाती साबित हो सकता है।
