नई दिल्ली। भारत में 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और संयुक्त किसान मोर्चा सहित ग्रामीण मजदूर संगठनों ने केंद्र सरकार की “मजदूर-विरोधी, किसान-विरोधी और कॉरपोरेट समर्थक” नीतियों के खिलाफ ‘भारत बंद’ का आह्वान किया। इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल में लगभग 25 करोड़ कर्मचारियों ने हिस्सा लिया, जिससे बैंकिंग, डाक, बिजली, कोयला खनन, परिवहन और निर्माण जैसे क्षेत्रों में सेवाएं प्रभावित हुईं। यूनियनों ने 17 मांगों को उठाया, जिनमें नए श्रम कानूनों को रद्द करने, निजीकरण रोकने, न्यूनतम वेतन बढ़ाने और सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार शामिल हैं।
हड़ताल का व्यापक असर पश्चिम बंगाल, केरल, बिहार और ओडिशा में देखा गया। कोलकाता में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए लाठीचार्ज किया, जबकि केरल के कोट्टायम में दुकानें और मॉल बंद रहे। बिहार में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने ‘चक्का जाम’ में हिस्सा लिया, जो मतदाता सूची संशोधन के खिलाफ भी था। भुवनेश्वर में CITU ने राष्ट्रीय राजमार्ग जाम किया। हालांकि, बेंगलुरु और तमिलनाडु में सामान्य गतिविधियां कम प्रभावित हुईं।
केरल में सार्वजनिक परिवहन दो दिनों तक प्रभावित
केंद्र सरकार ने दावा किया कि RSS समर्थित भारतीय मजदूर संघ सहित 213 यूनियनों ने हड़ताल में हिस्सा नहीं लिया। रेलवे यूनियनों ने भी औपचारिक रूप से समर्थन नहीं किया, लेकिन कुछ ट्रेन सेवाएं बाधित हुईं। केरल में सार्वजनिक परिवहन दो दिनों तक प्रभावित रहा। यूनियनों ने आरोप लगाया कि चार श्रम संहिताएं मजदूरों के अधिकारों को कमजोर करती हैं और नियोक्ताओं के लिए दंड खत्म करती हैं।
सुरक्षा के लिए राज्यों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किए गए। स्कूल, कॉलेज और सरकारी कार्यालय खुले रहे, लेकिन बैंकिंग और डाक सेवाओं में व्यवधान देखा गया। यह हड़ताल पहले भी 2020, 2022 और 2024 में हुई समान हड़तालों की कड़ी में है।
