नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ ने 17 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले की आलोचना करते हुए संसद की सर्वोच्चता पर जोर दिया। उन्होंने तमिलनाडु मामले में कोर्ट के उस निर्णय को ‘न्यायिक अतिक्रमण’ करार दिया, जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधायिका द्वारा दोबारा पारित विधेयकों पर तीन महीने में निर्णय लेने की समयसीमा दी गई थी।
धनखड़ ने कहा कि अनुच्छेद 142, जो सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय के लिए व्यापक शक्तियां देता है, ‘लोकतांत्रिक शक्तियों के खिलाफ परमाणु मिसाइल’ बन गया है। उन्होंने जोर देकर कहा, “भारत में जजों को कानून निर्माता, कार्यकारी या सुपर संसद बनने की अनुमति नहीं है।”
तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि की हुई थी आलोचना
धनखड़ की यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आई, जिसमें तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित 10 विधेयकों पर कार्रवाई में देरी को लेकर राज्यपाल आरएन रवि की आलोचना की गई थी। धनखड़ ने इसे संवैधानिक ढांचे का उल्लंघन बताया और कहा कि संसद, जो जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है, सर्वोच्च है। उन्होंने संविधान निर्माताओं का हवाला देते हुए कहा कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट पर अराजकता फैलाने का आरोप
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने धनखड़ का समर्थन करते हुए सुप्रीम कोर्ट पर ‘अराजकता फैलाने’ का आरोप लगाया। उन्होंने वक्फ (संशोधन) अधिनियम जैसे मामलों में कोर्ट के हस्तक्षेप को ‘धार्मिक युद्ध भड़काने’ वाला बताया। भाजपा नेता दिनेश शर्मा ने कहा, “राष्ट्रपति सर्वोच्च हैं, कोई उन्हें निर्देश नहीं दे सकता।” हालांकि, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इन टिप्पणियों को निजी विचार बताकर पार्टी को इससे अलग किया।
विपक्ष ने सरकार पर बोला हमला
विपक्ष ने इसकी कड़ी आलोचना की। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे ‘संवैधानिक संस्थाओं पर हमला’ करार दिया, जबकि टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने इसे ‘न्यायपालिका को धमकाने’ की कोशिश बताया। यह विवाद विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन पर बहस को तेज करता है।
