LPG संकट का देसी इलाज तैयार: DME ब्लेंड से 20% तक बचत, लेकिन 2020 से धूल चाट रहा है समाधान!

LPG संकट का देसी इलाज तैयार

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में ईरान-अमेरिका-इजरायल तनाव के कारण भारत में LPG संकट फिर से उभर आया है। देश सालाना करीब 31.3 मिलियन मीट्रिक टन LPG इस्तेमाल करता है, जिसमें 60-67% आयात होता है और उसका 90% से ज्यादा हिस्सा हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है। हाल की बाधाओं से साप्ताहिक आयात में 30% की गिरावट आई, जिससे शहरों में कमर्शियल सिलेंडर की सप्लाई रुक गई और घरेलू उपयोग पर भी असर पड़ा। सरकार ने एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट लागू कर घरेलू प्राथमिकता दी है, लेकिन यह संकट आयात निर्भरता की गहरी समस्या को उजागर करता है।इ

स संकट का एक देसी समाधान मौजूद है-  डाइमिथाइल ईथर (DME), जिसे पुणे के CSIR-नेशनल केमिकल लेबोरेटरी (NCL) ने विकसित किया है। यह तकनीक 2020 से ही डेमोंस्ट्रेशन-रेडी है, जहां मेथनॉल को कैटलिस्ट की मदद से डिहाइड्रेट कर DME बनाया जाता है। भारत के कोयला, बायोमास या कैप्चर्ड CO₂ से मेथनॉल बनाकर पूरी तरह स्वदेशी उत्पादन संभव है। DME को LPG में 20% तक ब्लेंड किया जा सकता है (BIS स्टैंडर्ड के अनुसार), बर्नर और सिलेंडर में ज्यादा बदलाव की जरूरत नहीं पड़ती। यह LPG से 10-15% ज्यादा कुशल है, कम NOx/SOx उत्सर्जन करता है, कोई कालिख नहीं छोड़ता और स्वच्छ जलता है। CSIR-NCL ने पायलट प्लांट में 98% से ज्यादा सिलेक्टिविटी और 84% कन्वर्जन हासिल किया है।

समाधान 2020 से इंतजार कर रहा

फिर भी यह समाधान 2020 से इंतजार कर रहा है। पायलट क्षमता 20-24 लीटर/दिन से बढ़कर 250 किलो/दिन हो गई, लेकिन कमर्शियल स्केलिंग नहीं हुई। नीति आयोग ने मेथनॉल इकोनॉमी के तहत कोयला-टू-मेथनॉल और DME प्लांट्स की योजना बनाई थी, लेकिन क्रियान्वयन नहीं हुआ। कोई बड़ा ऑफ-टेकर नहीं मिला, ब्लेंडिंग मैंडेट नहीं आया, इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रांजिशन की कमी रही और फीडस्टॉक (मेथनॉल) में भी आयात निर्भरता बनी हुई है। हाल में डॉ. रघुनाथ माशेलकर ने मार्च 2026 में एक्स पर 2.5 टन/दिन डेमोंस्ट्रेशन प्लांट के लिए फंडिंग की मांग की है और Engineers India Limited, CSIR-IICT-BHEL जैसे संगठनों के MoU बने हैं।

DME को स्केल करने का मौका बन सकता है

यह संकट DME को स्केल करने का मौका बन सकता है। अगर केंद्र हाई टेक्नोलॉजी (CHT) से फंडिंग कर प्लांट बनाए, ब्लेंडिंग मैंडेट (जैसे 10% DME in LPG) लागू करे और मेथनॉल इकोनॉमी को पॉलिसी सपोर्ट दे, तो लंबे समय में आयात निर्भरता कम हो सकती है। चीन में DME क्षमता 10 मिलियन टन/साल से ज्यादा है, जबकि भारत अभी पायलट स्तर पर है। विशेषज्ञों का कहना है कि संस्थागत इच्छाशक्ति की कमी है- वैज्ञानिक तैयार हैं, फीडस्टॉक (बायोमास, म्यूनिसिपल वेस्ट) उपलब्ध है, लेकिन नीतिगत कमिटमेंट की जरूरत है। यह संकट स्वदेशी ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में कदम उठाने का ट्रिगर बन सकता है।

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