नई दिल्ली। बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। विपक्षी दलों, खासकर इंडिया गठबंधन ने चुनाव आयोग के इस कदम को चुनौती दी है। उनका दावा है कि यह प्रक्रिया लगभग दो करोड़ मतदाताओं, खासकर गरीब और प्रवासी लोगों, को वोटिंग के अधिकार से वंचित कर सकती है। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉय माल्य बागची की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है।
चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को बिहार में SIR शुरू करने का आदेश दिया था, जिसका मकसद मतदाता सूची से अपात्र व्यक्तियों को हटाना और केवल योग्य नागरिकों को शामिल करना है। इसके लिए मतदाताओं को 25 जुलाई तक 11 प्रकार के दस्तावेज जमा करने हैं, जिसमें आधार और मतदाता पहचान पत्र शामिल नहीं हैं। विपक्ष का कहना है कि यह प्रक्रिया गरीबों, दलितों और महिलाओं के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है, क्योंकि उनके पास जरूरी दस्तावेज नहीं हो सकते। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने आयोग की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि 2003 में पूरे देश में हुई ऐसी प्रक्रिया अब केवल बिहार में क्यों लागू की जा रही है।
आयोग ने SIR को इतनी देर से क्यों शुरू किया: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूछा कि आयोग ने SIR को इतनी देर से क्यों शुरू किया। कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया में कोई गलती नहीं है, लेकिन इसे पहले शुरू करना चाहिए था। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण और अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि दस्तावेजों की अनिवार्यता और माता-पिता की पहचान का सबूत मांगना गरीब और प्रवासी मतदाताओं के लिए अन्यायपूर्ण है। कोर्ट ने आयोग से जवाब मांगा है।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि 25 जुलाई के बाद भी दावे और आपत्तियों की अवधि में मतदाताओं को मौका मिलेगा। 1 अगस्त को ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होगी। यह मामला बिहार की सियासत में हलचल मचा रहा है।
