नई दिल्ली। श्रीलंका ने अमेरिका के दो युद्धक विमानों को अपने क्षेत्र में उतरने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया है। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने 20 मार्च को संसद में इसकी जानकारी दी। अमेरिका ने 4 मार्च और 8 मार्च को जिबूती स्थित अपने बेस से दो फाइटर जेट्स (जिनमें 8 एंटी-शिप मिसाइलें लगी थीं) को मत्ताला अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे (दक्षिण-पूर्व श्रीलंका) पर लैंड करने और तैनात करने की अनुरोध किया था। दोनों अनुरोध ठुकरा दिए गए।
राष्ट्रपति ने कहा कि श्रीलंका मध्य पूर्व के ईरान संघर्ष में तटस्थ रहेगा और अपनी जमीन को किसी भी सैन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा, चाहे वह किसी पक्ष की मदद करे या नुकसान पहुंचाए।यह फैसला ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध के बीच आया है, जहां श्रीलंका ने पहले भी तटस्थता दिखाई है। मार्च की शुरुआत में अमेरिकी पनडुब्बी ने श्रीलंका के दक्षिणी तट के अंतरराष्ट्रीय जल में ईरानी फ्रिगेट IRIS Dena पर टॉरपीडो हमला किया, जिसमें जहाज डूब गया और 87 ईरानी नाविक मारे गए।
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बड़े पैमाने पर सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया
श्रीलंका ने डिस्ट्रेस सिग्नल पर बड़े पैमाने पर सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, 87 शव बरामद किए, घायलों का इलाज गाले में कराया और शवों को ईरान भेजा। इसके बाद ईरानी सपोर्ट शिप IRIS Bushehr ने इंजन खराब होने का हवाला देकर कोलंबो पोर्ट में एंट्री मांगी, जिसे मानवीय आधार पर अनुमति दी गई और जहाज को त्रिंकोमाली पोर्ट की ओर रीडायरेक्ट किया गया।
हम अपनी तटस्थता बनाए रखना चाहते हैं: दिसानायके
राष्ट्रपति दिसानायके ने संसद में कहा, “विभिन्न दबावों के बावजूद हम अपनी तटस्थता बनाए रखना चाहते हैं। हम झुकेंगे नहीं। मध्य पूर्व युद्ध चुनौतियां पेश कर रहा है, लेकिन हम हर संभव प्रयास से तटस्थ रहेंगे।” उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने दो विमानों को मत्ताला एयरपोर्ट पर लाने की मांग की थी, लेकिन श्रीलंका ने साफ मना कर दिया। यह फैसला अमेरिकी विशेष दूत सर्गियो गोरे के साथ बैठक के बाद आया, जहां इंडो-पैसिफिक में खुले क्षेत्र, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, पोर्ट्स और व्यापार पर चर्चा हुई थी।
श्रीलंका ने गुटनिरपेक्ष नीति पर जोर दिया
श्रीलंका ने गुटनिरपेक्ष नीति पर जोर दिया है। यह घटना श्रीलंका की विदेश नीति को दर्शाती है, जहां वह अमेरिका, चीन और भारत के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। ईरान युद्ध के कारण हिंद महासागर में तनाव बढ़ा है, लेकिन श्रीलंका ने अपनी जमीन को युद्ध का मैदान नहीं बनने दिया। राष्ट्रपति ने कहा कि देश किसी भी पक्ष के साथ नहीं जाएगा और क्षेत्रीय शांति के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रखेगा। यह फैसला वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि श्रीलंका जैसे छोटे देश भी बड़े शक्तियों के दबाव में तटस्थता दिखा रहे हैं।
