नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर नकदी बरामदगी के मामले में उनके खिलाफ साजिश के दावों को खारिज कर दिया। यह मामला 14 मार्च 2025 को उनके लुटियंस दिल्ली स्थित आवास पर आग लगने की घटना से शुरू हुआ, जब दमकलकर्मियों ने स्टोर रूम में जली हुई नकदी बरामद की।
समिति ने अपनी 40 दिन की जांच में 50 से अधिक लोगों के बयान दर्ज किए, जिनमें दिल्ली पुलिस आयुक्त संजय अरोड़ा और दिल्ली फायर सर्विस प्रमुख शामिल थे। समिति ने पाया कि नकदी स्टोर रूम में थी, जिस तक जस्टिस वर्मा के परिवार का नियंत्रण था और जली हुई नकदी को जांच से पहले हटा लिया गया था। समिति ने कहा कि गवाहों ने नकदी का ढेर देखा था।
नकदी की मौजूदगी पूरी तरह बेतुकी: जस्टिस वर्मा
जस्टिस वर्मा ने दावा किया था कि नकदी की मौजूदगी पूरी तरह बेतुकी है और यह एक साजिश है, क्योंकि घटना के समय वह और उनकी पत्नी भोपाल में थे। उन्होंने कहा कि स्टोर रूम सभी के लिए सुलभ था। हालांकि, समिति ने उनके इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि वह नकदी के स्रोत की व्याख्या करने में विफल रहे।
जस्टिस वर्मा को न्यायिक कार्य से हटाने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने 28 मार्च को जस्टिस वर्मा को न्यायिक कार्य से हटाने का आदेश दिया और उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया। पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश की थी और 3 मई 2025 की जांच रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजी थी।
कांग्रेस ने संसद के मानसून सत्र से पहले इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है, ताकि जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग पर फैसला लिया जा सके। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी इस मुद्दे पर चर्चा शुरू की है। यह मामला न्यायिक जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है।
