नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने योग गुरु रामदेव को फटकार लगाते हुए डाबर च्यवनप्राश के खिलाफ भ्रामक विज्ञापन चलाने से रोक दिया। जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने डाबर इंडिया की याचिका पर यह अंतरिम आदेश दिया। पतंजलि को ऐसे विज्ञापन तुरंत हटाने को कहा गया, जो डाबर के उत्पाद को नीचा दिखाते हैं। अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी।
डाबर ने दावा किया कि पतंजलि के विज्ञापनों में उनके च्यवनप्राश को ‘साधारण’ और असुरक्षित बताया गया। पतंजलि ने दावा किया कि उनका उत्पाद 51 जड़ी-बूटियों से बना है, जबकि डाबर के वकील संदीप सेठी ने कोर्ट को बताया कि इसमें केवल 47 जड़ी-बूटियां हैं। पतंजलि ने दिसंबर 2024 में समन मिलने के बाद भी एक हफ्ते में 6,182 बार ऐसे विज्ञापन प्रसारित किए। इनमें बाबा रामदेव ने दावा किया कि केवल पतंजलि ही आयुर्वेदिक परंपराओं का पालन करता है, जबकि अन्य च्यवनप्राश की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए।
डाबर का मार्केट पर 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी
डाबर, जिसका च्यवनप्राश बाजार में 60% से अधिक हिस्सेदारी रखता है, ने कहा कि ये विज्ञापन उनकी ब्रांड छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। कोर्ट ने पतंजलि को निर्देश दिया कि वह डाबर के उत्पादों को बदनाम करने वाले सभी विज्ञापन, चाहे टीवी, प्रिंट या डिजिटल माध्यम में हों, तुरंत हटाए। पतंजलि के वकील ने दलील दी कि उनके विज्ञापन सामान्य थे, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
यह मामला पतंजलि की विज्ञापन रणनीति पर सवाल उठाता है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि को भ्रामक, मिसलिडींग विज्ञापनों के लिए फटकार लगाई थी। डाबर ने कहा कि पतंजलि का व्यवहार प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता संरक्षण कानूनों का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने इस आदेश को उपभोक्ताओं के हित में बताया। इस फैसले से डाबर की बाजार स्थिति को सुरक्षा मिलेगी, जबकि पतंजलि को अपनी मार्केटिंग रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा।
