नई दिल्ली। लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन के लिए प्रॉपर्टी (रियल एस्टेट) और म्यूचुअल फंड दोनों लोकप्रिय विकल्प हैं। प्रॉपर्टी को सुरक्षित माना जाता है क्योंकि यह ठोस संपत्ति है, जिसकी वैल्यू आमतौर पर स्थिर रहती है। इसमें कैपिटल गेन के साथ किराए की नियमित आय भी मिलती है, लेकिन इसमें रजिस्ट्री, ब्रोकरेज, टैक्स और मेंटेनेंस जैसे खर्चे ज्यादा होते हैं तथा लिक्विडिटी कम है।
म्यूचुअल फंड का फायदा
म्यूचुअल फंड में कम राशि (500 रुपये से) से निवेश शुरू किया जा सकता है। यह पूरी तरह लिक्विड और पारदर्शी है। पिछले दो दशकों में अच्छे इक्विटी फंड्स ने 12-15% या उससे ज्यादा सालाना रिटर्न दिया है। कंपाउंडिंग का फायदा मिलता है और जरूरत पड़ने पर आसानी से बेचा जा सकता है, लेकिन शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव का जोखिम रहता है।
कौन बेहतर?
उदाहरण के तौर पर, 2015 में 65 लाख रुपये से खरीदे गए फ्लैट की वैल्यू 2026 में 1.25 करोड़ हुई (CAGR करीब 6-7%, किराया जोड़ने पर 8-9%)। वहीं इतनी राशि अच्छे म्यूचुअल फंड में लगाने पर 2.3-2.8 करोड़ तक हो सकती थी। लंबे समय में म्यूचुअल फंड अक्सर आगे रहते हैं, लेकिन जरूरत के अनुसार दोनों में डायवर्सिफिकेशन करना सबसे अच्छा है।
