नई दिल्ली। लखनऊ के अलीगंज सेक्टर-डी में एक तीन मंजिला कॉमर्शियल बिल्डिंग में लगी भीषण आग ने 15 युवा छात्रों की जान ले ली। आग की लपटें भले बुझ गई हों, लेकिन पीड़ित परिवारों के आंसू और सवाल अभी थमे नहीं हैं। परिजन पूछ रहे हैं कि आखिर जिम्मेदार कौन है? फायर ब्रिगेड दो मिनट में पहुंच गई थी, लेकिन घने धुएं ने रेस्क्यू ऑपरेशन को बेहद मुश्किल बना दिया। कई घंटों की मशक्कत के बाद भी जिंदगियां बच नहीं सकीं।
बिल्डिंग में आने-जाने के लिए सिर्फ एक संकरा रास्ता था और संकरी सीढ़ियां थीं। आग लगते ही धुआं और लपटों ने इसी रास्ते को बंद कर दिया। छात्र बाहर निकलने का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं ढूंढ पाए। बेसमेंट में गारमेंट्स का गोदाम भी था, जिससे आग तेजी से फैली। प्रारंभिक जांच में शॉर्ट सर्किट को वजह माना जा रहा है।
पूर्व में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई रुकी
बिल्डिंग रिहायशी इलाके में थी, लेकिन व्यावसायिक उपयोग हो रहा था। पहले ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी, जो रुक गई। स्वीकृत 20 kW के बजाय 34 kVA तक लोड बढ़ गया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। बिजली कनेक्शन के रिकॉर्ड में भी गड़बड़ी सामने आई। योगी सरकार ने एलडीए के अधिकारियों को सस्पेंड किया, जांच समिति गठित की और मालिकों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की।
सिर्फ आग या लापरवाही की साजिश?
15 परिवारों के चिराग बुझ गए, लेकिन शहर अब जवाब मांग रहा है। क्या सुरक्षा मानकों की अनदेखी, अवैध निर्माण और विभागीय लापरवाही ने इस हादसे को हत्याकांड बना दिया? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मृतकों के परिवारों को मुआवजा घोषित किया है। पूरा मामला राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का केंद्र बन गया है।
